OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्र की संशोधन याचिका खारिज

नई दिल्ली
OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुना दिया है. कोर्ट ने UPSC परीक्षाओं में OBC क्रीमी लेयर आरक्षण पर केंद्र सरकार की संशोधन याचिका खारिज कर दी है. SC ने दोहराया है कि OBC आरक्षण देने के लिए माता-पिता की वेतन से होने वाली आय को नहीं गिना जाएगा. OBC क्रीमी लेयर के दायरे से बाहर रखने के लिए केवल माता-पिता के सामाजिक-आर्थिक दर्जे को ही आधार माना जाएगा।
कोर्ट ने 11 मार्च 2026 के अपने फैसले के पूर्वव्यापी (Retrospective) असर को सीमित कर दिया है. यानी पुराने मामलों में नियुक्तियां, सीनियरिटी और प्रमोशन दोबारा नहीं खोले जाएंगे।
दरअसल, केंद्र सरकार ने 11 मार्च के फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा था, जिसमें कहा गया था कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के किसी उम्मीदवार की 'क्रीमी लेयर' स्थिति का निर्धारण केवल उसके माता-पिता की वेतन आय के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि उनके द्वारा संभाले गए पदों की श्रेणी पर भी विचार किया जाना चाहिए।
इस फैसले से 2025 UPSC बैच को राहत मिलेगी. सिविल सेवा परीक्षा 2025 के चयनित उम्मीदवारों का सर्विस अलॉटमेंट मार्च 2026 के फैसले के मुताबिक होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मार्च का फैसला मूल मामले के पक्षकारों पर लागू होगा. पहले से नियुक्त लोगों की सीनियरिटी और प्रमोशन दोबारा नहीं खोले जाएंगे. दूसरे लंबित मामलों पर संबंधित अदालतें उनके तथ्यों और पात्रता के आधार पर अलग-अलग फैसला करेंगी।
OBC क्रीमी लेयर पर केंद्र सरकार को दो साल का वक्त देने से इनकार
केंद्र ने PSU और प्राइवेट सेक्टर की नौकरियों के पदों की सरकारी पदों से समानता तय करने और नई व्यवस्था बनाने के लिए दो साल का समय मांगा था. सुप्रीम कोर्ट ने यह मांग स्वीकार नहीं की. कोर्ट ने फैसले का पालन करने के लिए आठ हफ्ते का अतिरिक्त समय दिया है।
OBC क्रीमी लेयर का मामला क्या है
यह पूरा मामला OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने के तरीके से जुड़ा है. 1993 के सरकारी ऑफिस मेमोरेंडम (OM) के मुताबिक क्रीमी लेयर की पहचान के लिए माता-पिता की नौकरी में पद और सामाजिक स्थिति के साथ आय के मानक भी देखे जाते हैं. इसमें आय की गणना करते समय माता-पिता की सैलरी और कृषि से होने वाली कमाई को शामिल नहीं करने का प्रावधान है।
लेकिन PSU और निजी संस्थानों में काम करने वाले लोगों के पदों की सरकारी पदों से तुलना (Equivalence) तय नहीं होने पर 2004 के स्पष्टीकरण के आधार पर उनकी सैलरी भी आय के आकलन में जोड़ी जा रही थी।
इसी व्यवस्था को चुनौती देते हुए कुछ OBC अभ्यर्थियों ने कोर्ट का रुख किया था. उनका कहना था कि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए सैलरी को क्रीमी लेयर तय करने का आधार नहीं बनाया जाता, जबकि PSU और निजी संस्थानों में काम करने वालों के बच्चों के मामले में ऐसा किया जा रहा है. इससे समान स्थिति वाले अभ्यर्थियों के बीच भेदभाव हो रहा है।
11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अपील खारिज करते हुए साफ किया कि 1993 के नियमों के तहत आय/संपत्ति की गणना में माता-पिता की सैलरी और कृषि आय को शामिल नहीं किया जा सकता।



